Tuesday, March 1, 2011

त्रिवेणी

खिडकी खोलके देखने पर चाँद दामनमें आया करता था ,
आजकल वोंह भी छूपासा रहता है,बादलोंके जंगलेमें कहीं..

शायद उसने मेरी आँखोंमे, दुनियाकी बेजानी पढ़ ली ! 
                                                  
                                                               - गौरव   

6 comments:

  1. gr8 one...
    now im eagerly waiting an optimistic poem from you!!!!

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  2. मन:पूर्वक धन्यवाद !

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  3. अरे गौरवा!!! इंजिनीरिंग सोड रे... कविता लिहायला घे रे...
    जोक्स अपार्ट... तू खरच उत्कृष्ट लिहितोस...

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  4. खूप खूप आभार मित्रा ! Engg सोडायचं म्हणशील तर 'पोटा-पाण्याचा' प्रश्न आहे म्हणून रे.. असो..खरचं मनापासून धन्यवाद ! :)

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